बरसात में पशुओं को खुरपका-मुंहपका (FMD) रोग से कैसे बचाएं? जानें पूरी जानकारी

अगस्त 4, 2026 · मिनाक्षी जिंदल

बरसात में पशुओं को खुरपका-मुंहपका (FMD) रोग से कैसे बचाएं? जानें पूरी जानकारी

बरसात का मौसम शुरू होते ही पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन जाता है खुरपका-मुंहपका रोग, जिसे अंग्रेजी में Foot and Mouth Disease (FMD) कहा जाता है। यह एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है जो गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सुअर जैसे खुरदार पशुओं को तेजी से अपनी चपेट में लेती है। नमी और उमस भरे मौसम में यह वायरस बहुत तेजी से फैलता है, जिससे पशुओं का स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता दोनों प्रभावित होते हैं। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि FMD रोग क्या है, इसके लक्षण क्या होते हैं, यह कैसे फैलता है और बरसात के मौसम में इससे बचाव के लिए कौन-कौन से उपाय अपनाने चाहिए।

खुरपका-मुंहपका (FMD) रोग क्या है?

खुरपका-मुंहपका रोग एक वायरल बीमारी है जो पिकोर्नावायरस परिवार के वायरस से होती है। यह बीमारी मुख्य रूप से पशुओं के खुर और मुंह को प्रभावित करती है, इसीलिए इसे "खुरपका-मुंहपका" कहा जाता है। यह रोग तेजी से एक पशु से दूसरे पशु में फैलता है और अगर समय पर इलाज न किया जाए तो पशुओं की उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आ सकती है।

FMD रोग के मुख्य लक्षण

बरसात के मौसम में अगर आपके पशु में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत सतर्क हो जाएं:

  • पशु के मुंह, जीभ और मसूड़ों पर छाले पड़ना
  • खुरों के बीच घाव या सूजन आना
  • पशु का लंगड़ाकर चलना या खड़े होने में तकलीफ
  • तेज बुखार और सुस्ती
  • चारा खाना कम कर देना या बिल्कुल बंद कर देना
  • मुंह से लार का अधिक मात्रा में बहना
  • दूध देने वाले पशुओं में दूध उत्पादन में अचानक कमी

बरसात में FMD रोग तेजी से क्यों फैलता है?

मानसून के मौसम में नमी, कीचड़ और जलभराव की वजह से यह वायरस लंबे समय तक जीवित रह पाता है। गीली और गंदी जगहों पर पशु ज्यादा समय बिताते हैं, जिससे संक्रमण एक पशु से दूसरे पशु में आसानी से फैल जाता है। इसके अलावा दूषित पानी, चारा और संक्रमित पशुओं के सीधे संपर्क में आने से भी यह बीमारी तेजी से बढ़ती है।

FMD रोग से बचाव के आसान उपाय

पशुपालक निम्नलिखित उपायों को अपनाकर अपने पशुओं को इस बीमारी से सुरक्षित रख सकते हैं:

1. समय पर टीकाकरण कराएं FMD रोग से बचाव का सबसे कारगर तरीका है समय पर टीकाकरण। साल में दो बार (मानसून से पहले और बाद में) पशु चिकित्सक की सलाह से टीका जरूर लगवाएं।

2. पशुशाला की सफाई का ध्यान रखें पशुओं के रहने की जगह को हमेशा सूखा और साफ रखें। कीचड़ और जलभराव को तुरंत हटाएं ताकि वायरस पनपने का मौका न मिले।

3. संक्रमित पशु को अलग रखें अगर किसी पशु में FMD के लक्षण दिखें, तो उसे तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें ताकि संक्रमण न फैले।

4. साफ पानी और पौष्टिक चारा दें पशुओं को हमेशा साफ और ताजा पानी पिलाएं। दूषित पानी और चारा बीमारी फैलने का बड़ा कारण बनता है।

5. नियमित जांच कराएं पशु चिकित्सक से समय-समय पर पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण कराते रहें, ताकि बीमारी की शुरुआती पहचान हो सके।

6. पशुशाला में कीटाणुनाशक का छिड़काव करें पशुओं के बाड़े और आसपास के क्षेत्र में नियमित रूप से कीटाणुनाशक दवाओं का छिड़काव करें।

7. बाहरी पशुओं के संपर्क से बचाएं नए या बाहर से आए पशुओं को कुछ दिनों तक स्वस्थ पशुओं से अलग रखें, ताकि किसी संक्रमण की आशंका को समय रहते जांचा जा सके।

अगर पशु FMD से संक्रमित हो जाए तो क्या करें?

अगर आपका पशु इस बीमारी की चपेट में आ जाता है, तो घबराने के बजाय तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। संक्रमित पशु के घावों की साफ-सफाई रखें, उसे नरम और पौष्टिक चारा दें, और पशु चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाओं का नियमित रूप से इस्तेमाल करें। इस दौरान पशु के आहार पर विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि कमजोर पशु का शरीर बीमारी से लड़ने में सक्षम नहीं हो पाता।

बीमारी के बाद पशु के पोषण का रखें खास ख्याल

FMD जैसी बीमारी के बाद पशु का शरीर कमजोर हो जाता है और उसकी उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे समय में पशु को ऐसा आहार देना जरूरी है जो उसे जल्दी ऊर्जा दे और उसके स्वास्थ्य को दोबारा पटरी पर ला सके। यही वजह है कि पशुपालकों को अपने पशुओं के दैनिक आहार में पौष्टिक और संतुलित खल-बिनौला जैसे उत्पादों को जरूर शामिल करना चाहिए, जिससे पशु जल्दी स्वस्थ हो सके और उसका दूध उत्पादन भी बना रहे।

बरसात के मौसम में पशुओं का स्वास्थ्य बनाए रखना हर पशुपालक की जिम्मेदारी है। सही समय पर टीकाकरण, साफ-सफाई और पौष्टिक आहार से खुरपका-मुंहपका जैसी गंभीर बीमारी से आसानी से बचा जा सकता है। इसी कड़ी में अगर बात करें पशुओं के बेहतरीन पोषण की, तो SRNK Group का शुभ लाभ ब्रांड बिनौला खल एक भरोसेमंद विकल्प है, जो पशुओं को भरपूर पोषण देने के साथ-साथ उनकी उत्पादन क्षमता यानी दूध उत्पादन को भी बढ़ाने में मदद करता है। बरसात के मौसम में जब पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, तब शुभ लाभ बिनौला खल पशुओं को जरूरी प्रोटीन और ऊर्जा प्रदान कर उन्हें जल्दी स्वस्थ रखने में सहायक होता है, जिससे किसानों और पशुपालकों को बेहतर आर्थिक लाभ भी मिलता है।